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मुद्राराक्षस संकलित कहानियां

मुद्राराक्षस

प्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया प्रकाशित वर्ष : 2008
पृष्ठ :203
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 7243
आईएसबीएन :978-81-237-5335

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कथाकार द्वारा चुनी गई सोलह कहानियों का संकलन...

फरार मल्लावां माई राजा से बदला लेगी


छोटी लाइन वाली गाड़ी मल्लावां माई पर रुकती नहीं है। हां, देखने वालों को लगता है, वह उस तीन-चार सौ गज की समतल पट्टी पर पहुंचकर हल्के से ठिठकती है। पर यह शुद्ध भ्रम है। गाड़ी वहां से कोई एक कोस आगे मल्लावां खास पर रुकती है। हो सकता है, वह रुकने की तैयारी मल्लावां माई से ही शुरू कर देती हो। सीटी वह हमेशा इसी समतल पट्टी पर पहुंचकर बजाती है, दो बार हिचकी लेकर फिर बहुत तीखे लंबे स्वर में। लोग कहते हैं. वह मल्लावां माई का नाम लेती है। आकाश की तरफ गर्दन उठाकर, खूब लंबी सांस खींचकर।

मल्लावां खास सरकारी नाम है। मल्लावां माई भी जगह का अपना नाम नहीं है। जहां आज मल्लावां माई या उसके गिरते हुए खंडहर हैं, वहीं एक बस्ती हुआ करती थी मल्लावां। ढहती कच्ची दीवारों से अटकी काली, सड़ी बल्लियों और दरवाजों की उखड़ी चौखटों के अवशेष वाली इस उजाड़ जगह के उस पार थोड़े फासले पर जो पक्की इमारत थी, वह भी ढहती दीवारों और बिखरती ईंटों के ढेर में बदल चुकी है।

कहते हैं, इन खंडहरों में दुधारू जानवर कभी नहीं आते। सिर्फ सोमवार की शाम इन खंडहरों से बाहर रेल की पटरी से सटी समतल जमीन पर औरतों का एक झुंड दिखाई देता है। यह झुंड वहां सूरज डूबने के बाद तक ठहरता है और फिर इधर-उधर बिखर जाता है।

हर सोमवार जब सूरज उतरना शुरू करता है, आसपास की गर्द और दरख्तों के रहस्यजाल से औरतें धीरे-धीरे प्रकट होती हैं। वे सब एक ही गीत गाती हैं। लेकिन बहुत देर तक गीत के बजाय अस्पष्ट जंगी आवाजों की गुंजलक-सी ही वहां फैलती रहती है। जैसे बांसों के झुरमुट से हवा उलझ-उलझकर सीत्कार कर रही हो, या जैसे बीन में कोई संपेरा सुर भर रहा हो।

औरतों का वह गीत कई तरफ से आता है और इसी समतल पट्टी के बीचोबीच बने एक बहुत छोटे-से चबूतरे पर इकट्ठा हो जाता है।

गीत बड़ा विचित्र है-असुर दानव सीतला माई को चिट्ठी लिखता है, मैं तुमसे ब्याह करूंगा। सीतला माई असुर दानव को चिट्ठी भेजती हैं, मैं तेरा संहार करूंगी।

उनचास हाथी और पचास घोड़े लेकर असुर दानव आया था। देवी के हाथ में ढाल और तलवार थी। देवी लड़ते-लड़ते मठ में समा गई। असुर मर गया। हे भवानी देवी-हे शीतला माई!

औरतें गाती हैं, बहुत ऊँचे स्वर में, लेकिन सभी अलग अपनी लय में। इसलिए समवेत गायन जैसा कुछ नहीं होता। दूर पर कहीं बहुत-सी तलवारों के देर तक टकराने जैसी आवाज गूंजती है। धुंधलका होते-होते तलवारों के टकराने की यह आवाज फिर बिखरने लगती है और वहां से आखिरी औरत के गायब होने तक बांसों में उलझती हवा की सनसनी जैसी सुनाई देती रहती है। हो सकता है, मेरे जैसे आदमी को हर गाँव थोड़ा असामान्य ही लगे, पर मल्लावां निश्चय ही ऐसी जगह है, जहां खड़े होकर सहज बिल्कुल नहीं रहा जा सकता। मैंने रातों को वहां अंधेरा कुछ ज्यादा ठहरा हुआ, लगभग जमा हुआ-सा पाया और आदमी खुश्क होकर बुझे दीए की तरह खामोश।

मुझे अब महसूस हुआ, रामेश्वर बाबू में भी दरअसल यही आदत रही होगी। मुझे हमेशा लगता रहा है कि रामेश्वर मितभाषी हैं। अक्सर दो-चार शब्दों से ज्यादा कभी नहीं बोलते। कार्यकारिणी या राष्ट्रीय परिषद की धुआंधार बैठकों में भी बहत ज्यादा जरूरी होने पर ही एक-दो वाक्य बोलते हैं। उनके साथ कई बार लंबी यात्राएँ भी की हैं। यात्राओं के दौरान मैंने उन्हें बातचीत के लिए उत्सुक कभी नहीं पाया।

वे महासंघ के उपाध्यक्ष हैं। चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की यूनियन के अध्यक्ष हैं। उनकी यूनियन के सदस्यों को उन पर अंधविश्वास है। एक बार उनके सदस्यों की एक सभा में उन पर भाषण देने के लिए दबाव डाला गया। वह भाषण मुझे आज भी याद है, क्योंकि चार के अलावा पांचवां वाक्य वे नहीं बोले थे।

सहसा मैं इनके इस तरह मितभाषी होने का रहस्य जान गया। खामोशी तो उन्हें अपने परिवेश से मिली थी।

चारपाई पर लेटे हुए.वे इस समय भी इतने ही खामोश थे। सुबह से वे सिर्फ तीन बार अपने हमेशा जैसे संकेत-वाक्यों में बोले थे। मेरे आने पर उन्होंने लेटे-लेटे नमस्कार किया और पूछा, 'वहां सब ठीक?'

मैंने उन्हें संक्षेप में यूनियन की स्थिति बता दी। सुनकर वे चुप हो गए। बस। दागदार मत्थे वाले हथौड़े से तांबे की मोटी चादर को लापरवाही से पीटकर गढ़े गए-से उनके चेहरे पर यातना की कमजोरी के बावजूद हमेशा जैसी भिंची मुस्कराहट बनी हुई थी। मुझे कसमसाते देखकर उन्होंने धीरे से पूछा, 'गर्मी?'

वहां गर्मी थी। हवा थमी होने की वजह से घुटन भी थी, जो एक बेचैनी-सी पैदा करती थी। पर मैं भरसक अपनी इस असुविधा को जाहिर नहीं होने देना चाहता था।

मल्लावां नाम की इस जगह की यह मेरी तीसरी यात्रा थी। बिना किसी पूर्व योजना के। तीनों ही यात्राएँ लगभग अनायास ही हुई थीं, लेकिन मैं भाग्यवादी होता तो अब तक जरूर यह विश्वास कर. चुका होता कि कहीं न कहीं इन यात्राओं के आयोजन में मल्लावां माई का हस्तक्षेप है।

पहली बार मल्लावां खास में रामेश्वर बाबू की बेटी की शादी में आया था। हालाँकि वैसी खामोश और किसी कदर उदास शादी मैंने जीवन में कभी नहीं देखी थी। किसी तरह की सजावट, अतिरिक्त रोशनी की कोशिश तक वहां नहीं थी। विवाह की सज्जा के नाम पर बाहरी दरवाजे के दोनों तरफ आक के चंद पत्तों पर छोटे आकार के दीए जला दिए गए थे। बाजे तो थे ही नहीं, किसी भी तरह के।

मेरी रुचि विवाह की रस्म देखने में थी और उसके लिए जागना पड़ता। रामेश्वर को विश्वास था कि शहर में रहने वाला मैं इस तरह जाग नहीं सकता और बिना हवा के सो भी नहीं सकता। दो-तीन शब्दों में ही उन्होंने अपना विनम्र लेकिन अनिवार्य फैसला दे दिया कि मुझे खाना खाने के बाद सो जाना होगा। उनकी बात काटने की कोई गुंजाइश नहीं थी। चारपाई पर हथकरघे वाली एक नई चादर बिछी थी। तकिया उसी चादर से ढका हुआ था। मेरी आदत सोते वक्त हर करवट के साथ तकिए को अलग-अलग कोण से इस्तेमाल की रही है। मैंने तकिए पर से चादर पलट दी। तकिया चादर से जानबूझकर ढका गया था। वह ज्यादा साफ नहीं था। उसे ज्यों-का-त्यों ढककर मैं लेट गया। साथ आया आदमी सिरहाने खड़ा होकर पंखा हिलाने लगा। यह मुझे अच्छा नहीं लगा। पर मेरी वर्जना से वह प्रभावित नहीं हुआ। जाहिर है, रामेश्वर के आदेश को वह किसी भी कीमत पर टाल नहीं सकता था।

सिरहाने पंखा झलने वाले अजनबी की मौजूदगी और तकिए की अरुचिकर स्थिति के कारण सो पाना आसान नहीं था।

गहरे नीले आसमान पर बहत साफ चमकते हुए सितारों के जाल की पृष्ठभूमि में छोटे-छोटे चमगादड़ उड़ते हुए कलाबाजियाँ खा रहे थे। बचपन में इस तरह उड़ते चमगादड़ी की तरफ मैं एक कपड़ा उछाल देता था और चमगादड़ उस पर झपटकर उसी के साथ नीचे आ जाता था।

देर तक नींद न आ सकने की आशंका से मुझे थोड़ी बेचैनी होने लगी थी इसलिए मैं यत्नपूर्वक अपने मन को कहीं और व्यस्त कर लेना चाहता था। पूरे मल्लावां में रामेश्वर के चेहरे की खामोशी थी, पर नीचे घर के किसी कोने से बिना ढोलक या मंजीरे की संगत के अजीब घुटी-सी और उदास आवाज में कुछ औरतें गा रही थीं-एक बहुत ही अजीब गीत-खा लो, खा लो। दही-भात खा लो, तुम्हारी बेटी पहर रात रहे विदा हो रही है। ओ मेरी माँ, तुम भैया को तो हमेशा बड़ी खुशी से खाना खिलाती थीं और मुझे खाना नाराज होकर ही देती थीं। अरे मेरी मां, मैं और मेरा भाई साथ ही जनमे ये, साथ खेले थे, पर भैया को तुमने पिता का राज दे दिया और मेरी शादी इतनी दूर कर दी। अम्मां, अब तुम खुशी-खुशी दही-भात खाओ।

इतनी गहरी चुप्पी के बीच ऐसे दर्दनाक गीत को सुनते-सुनते शायद थोड़ी देर के लिए मैं सो गया था, क्योंकि जब दुबारा मैंने आसमान की तरफ निगाह डाली तो लगा, सितारों पर भाप-सी जम गई है और नीचे से सिर्फ किसी बर्तन की आवाज आ रही है, जैसे उसे खुरचा जा रहा हो। सिरहाने खड़ा आदमी उसी तरह पंखा झले जा रहा था।

पैर के टखनों और पंजों पर तेज खुजली और जलन महसूस हुई। इस बीच वहां शायद कई मच्छरों ने बहुत इत्मीनान से काटा था।

जिसे मैंने सितारों पर छाई भाप समझा था, वह सुबह का पूर्वाभास था। टखनों और पंजों की खुजली ने खासा ही बेचैन कर दिया था। मैं उठ गया।

सिरहाने खड़ा आदमी पंखा हिलाना रोककर मुझे देखने लगा, फिर तुरंत नीचे चला गया।

रामेश्वर उस वक्त सचमुच दही-भात खा रहे थे और अपने स्वभाव के विपरीत खासी रुचि से। बेटी विदा हो चुकी थी। मगर क्या रात को ही?

कुछ मैली दरियाँ, फूल-पत्ते, बरामदे में फैले कुछ बर्तन और मिट्टी के एक घड़े पर जल रहे ताजे दीए के अलावा वहां शादी का और कोई निशान नहीं था। मंडप भी नहीं। वेदी भी नहीं, गैस-बत्ती भी नहीं। कई लालटेनों से काम चलाया गया था, जो अब बिल्कुल ठंडी थीं।

दिन होते-होते इस विचित्र विवाह-संस्कार को लेकर सवाल उभर आए थे और मुझे एक उलझन-सी होने लगी थी। इस पारिवारिक घटना के बारे में बहुत ज्यादा जानकारी लेने में अपने संकोच के बावजूद मैंने रामेश्वर बाबू से कुछेक सवाल जरूर किए। मेरे कई, एक-दूसरे में उलझे सवाल उन्होंने एक साथ सुने और हमेशा की तरह मेरे चेहरे को देखकर देर तक मुस्कराते रहे। इसके बाद तारघर जैसी सांकेतिक भाषा में उन्होंने जो कुछ बताया वह बहुत संतोषजनक नहीं था।

मल्लावां में किसी जमाने में एक दर्दनाक रिवाज था। मल्लावां की हर लड़की को शादी के बाद पहली रात मल्लावां के सामंत के साथ बितानी होती थी। जाने कब तक सामंत इसी तरह डोली लेता रहा। और तब एक बार एक लड़की ने सहसा इस नियति से इनकार कर दिया। दूल्हा और बाराती सामंत की सेना से लड़ते हुए मारे गए और वह नवविवाहिता सती हो गई।

सती के शाप से सामंतों का परिवार नष्ट हो गया। गाँव वालों में उन्हीं दिनों से बेटी की शादी चुपचाप, लगभग छुपाकर करने का रिवाज चल पड़ा था।
“आप भी यह सब मानते हैं?" मैंने वापसी में अपनी हैरानी दबाने की कोशिश करते हुए पूछा।

"हाँ।"

"मगर अब तो सामंत नहीं हैं?"

जवाब में उन्होंने अपनी हमेशा जैसी सख्त मुस्कराहट के साथ मेरी तरफ देखा और बस। जाने क्यों, कई रोज तक रामेश्वर बाबू को देखकर मुझे एक बैचेनी-सी महसूस होती रही थी, किसी अनजाने बियाबान में भटक जाने की-सी। या शायद कुछ और।

मल्लावां की दूसरी यात्रा खराब स्थितियों में हुई। उन दिनों हमारी यूनियन खासी परेशानी में थी। कुछ लोगों ने एक समानांतर संगठन बना लिया था और उनकी सफलता का सबूत यह भी था कि सरकार ने उनसे कर्मचारियों की समस्याओं पर बातचीत भी शुरू कर दी थी। इसके विरोध में मंत्री के घर पर एक बड़े प्रदर्शन और धरने की बात तय हुई। प्रदर्शन के तीन दिन पहले से रामेश्वर बाबू गायब थे। मैंने जाहिर नहीं किया, लेकिन इस अनुपस्थिति ने मुझे गहरी आशंकाओं में लपेट दिया था। रामेश्वर हमारी सबसे बड़ी शक्ति ही नहीं, हमारा आत्मविश्वास भी थे। पर उपाय कोई नहीं था। प्रदर्शन तो होना ही था।

मुझे लगभग बौखला देने की स्थिति तक चकित करते हुए रामेश्वर ठीक उस वक्त प्रकट हुए जब मंत्री की कोठी पर पहला नारा लगाया गया।

उनकी इस अनुपस्थिति पर मैं उनसे जवाबतलब करूँ, इससे पहले ही वे व्यस्त हो गए। धरने की बाकी तैयारियों में लोग यह भूल गए थे कि यहां ऐसी किसी ऊँची जगह की भी व्यवस्था करनी थी, जहां से नेता भाषण दे सकें। अभी शुरुआती नारे लग ही रहे थे कि रामेश्वर बाबू ने दो साइकिलों को जोड़कर तख्ने और छोटे डंडों के सहारे एक कामचलाऊ मंच तैयार कर दिया।

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